गांघी जी के तीन गुणी बन्दर

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 जैसा की देख कर पता चल रहा है के भारत के स्वतंत्रता दिवस 15 अगस्त का दिन है एवं झंडा फहराने के बाद का दृश्य है। देश-विदेश की बात होते-होते बात उठी गयी थी गांधी जी के तीन बंदरों की क्योंकि वे कोई मामूली बन्दर नहीं थे। तीनों के तीनों गुणवान थे। एक को बुरा न सुनने का गुण था। दूसरा बुरा ना देखता था और तीसरा बुरा न कहता था। कुछ ऐसी ही कहानी आपने भी कभी सुनी होगी। पर हमारा टॉपिक ऑफ़ डिस्कशन ही कुछ अलग था। हम सभी मित्र फ़ोटो खीचने के बाद गांधियन युग के उन् बंदरों का अस्तित्व सन् 2015 में खोजने लगे।
                                  चर्चा चली सबने अपना अपना निष्कर्ष और वक्तव्य रक्खा पर आश्चर्य न हुआ यह जान कर की गांधीजी के तीनों बन्दर अभी भी हमारे अंदर जीवित हैं पर हमलोगों को इसका एहसास भी नहीं। एहसास हो भी तो कहाँ से? उनके गुणों में उनके सबसे बड़े अवगुण जो छुपे हुए हैं जिसपर गौर फरमाना चाहिए। वो यह के पहला गुणी बन्दर जो बुरा सुन नहीं पाता वह फर्राटे से बुरा बोलता है और देखता है। दूसरा गुणी बन्दर जो बुरा देख नहीं पाता पर बुरा कहने और सुनने में फॉरवर्ड है। और तीसरा गुणी बन्दर जो बुरा सुन नहीं पाता पर बुरा देखने और कहने में सक्षम है। गांधीजी के इन तीन बंदरों ने जो गुण और अवगुण का मेल दिखाया है उसका ratio 2:1 बनता है। यानि एक गुण पर दो अवगुण मुफ़्त-मुफ़्त-मुफ़्त। अब आप ही सोच लीजिये के आज के ज़माने में जहाँ हमारे अंदर एक गुण एवं दो अवगुण निहित हो तो समाज में भ्रस्टाचार, दुराचार, बलात्कार, अत्याचार, पिछड़ी-रूढ़िवादी सोच जैसे मन लुभावन केला रूपी फल तो हम ही जैसे बंदरों का मन् लालचायेगा ही! जबकि होना यह चाहिए था के उन तीन गुणी बंदरों के तीनो के तीनो गुण एक-एक इंसान में पाया जाना चाहिए था!

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