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Showing posts from August, 2015

पागलों की अपनी छोटी सी दुनिया

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इस दुनिया में पागलों की कमी नहीं है! कुछ होते हैं पर दीखते नहीं और जो दीखते हैं वो होते नहीं! इन्हे न कोई रोकने वाला न कोई टोकने वाला! उनकी हरकतें ही हमें अपनी तरफ आकर्षित करती हैं इसलिए चाहते हुए भी नज़र नहीं हटती! कई दिनों से मेरा साक्छात्कार भी मानसिक रूप से पैदल लोगों से ज्यादा हो रहा है! वे आपको किसी भी जगह, किसी भी समय दिख सकते हैं! कभी कोई(पागल) मुझे कूड़े-कचरे के ढेर पर आराम से लेट कर गहन चिंता में मिला तो कभी कोई भरी गर्मी की दोपहरी में ताड़ के पत्तों का चिल्लम बना कर गांजा सुलगाते हुए मिला! यहाँ तक की रेलवे स्टेशन पर भी इनके कारनामे खुल्लम-खुल्ला होते हैं!









भूख-प्यास लगती है तो दूसरों के सामने स्वतः हाथ पसार देते हैं! इनके अंदर किंचित भी घमंड नहीं आता के दूसरों से कुछ मूह खोल कर मांगना मतलब अपनी बेइज़्ज़ती करना होता है! इन्हे ना लोक-लाज का डर ना ही कल सुबह ऑफिस जाने की जल्दी ना प्रोजेक्ट पूरा कर बॉस को देने का डेडलाइन और न ही कल के भोजन के लिए आज काम करने की जरुरत ! इन्हे समाज के काम करने के तरीके से कोई मतलब नहीं, जो भी करते हैं खुद से करते हैं भले ही ज़माना इन्हे मानसिक समझे! पर …