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Feeling of doing something new to my Blog

I was thinking to change my Blog Template from many days. I was not feeling like it was not very much appealing,but was not getting time to do so. Normally,I feel lazy lazy for doing any such things to my blog because I do not have any basic knowledge about languages like XHTML,HTML or CSS.

      But,to personalize the inbuilt icons and boxes of your blog template,you have to go though some changes in the HTML File. This was main reason for me to be lazy for completing this job. As I thought this will consume my lots of time as I am totally unaware of this.

       Finally,one day, I sat infront of my PC,searched Google and found some relative articles regarding this formatting of HTML for my personification. Finding help from these articles I edited and created my Blog Template and added required widgets and services. 
      The help from the articles which I found on internet made me feel like a techy.And I completed this work in a matter of time.Though I do not belong from that the science field.This feeling filled me up with excitement to always do something new by taking new challenges which are not for me.
      Thankfully,I got my blog as I desired it to be,with a sober,attractive and meaningful appearance.In future,I might make some or more changes to my blog,but this first experience was and will remain unique for me.

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कलकत्ता का प्रसिद्द बाबा भूतनाथ मंदिर और हावड़ा निवासी भक्त

कुछ
ढूंढली यादें और कंप्यूटर में रक्खे हुए कुछ फोटो ने मेरा ध्यान आकर्षित किया! जैसे ही मैंने फोटो देखने के लिए खोला तो सहसा याद आगया के यह सारे फोटो 2012 के सावन के महीने की हैं! वह मेरा आखरी सावन था जब बाबा धाम से लौटने के बाद, आखरी सोमवार को मैं अपने दोस्तों के साथ कलकत्ता के निमतला समसान घाट स्तिथ बाबा भूतनाथ के मंदिर गया था! आखरी सावन इसलिए क्यूंकि 2013 में पिता जी के परलोक सिधारने के बाद; ना ही मैं बाबा धाम गया और ना ही सावन के महीने में भूतनाथ मंदिर! समय बीतता गया, संन् 2014 आगया और मैं फिर से उसी जगह खड़ा हूँ जहाँ मैंने खुद को छोड़ा था! आज उन्ही यादों और अनुभव को कुछ पुराने फोटो के जरिये आपके सामने ला रहा हूँ!




मैं हावडा में रहता हूँ, इसलिए बाबा के मंदिर जाने के लिए मुझे बांधाघाट लांच घाट से फेरी पकड़नी पड़ती है! इस सुभ यात्रा की शुरुआत गंगा नदी पर सफर करने से शुरू होती है!


गंगा नदी पार करने के बाद, मंदिर के सामने सटे हुए नल से हाथ-पैर धो कर फूल-पत्रिका खरीदने के उपरांत मंदिर के द्वार के सामने लगे हुए कतार में लग जाने की कार्यविधि चालू होती है! सावन के महीने में श्रद्धालुओं के हुजूम क…

Viewing 51 Feet Tall Lord Shiva Statue at Bangeshwar Mahadev Mandir in Howrah, Eastern India.

One of it's kind in Eastern India, this 51 feet tall Lord Shiva statue was unveiled by Honorable President Of India Shri Pranab Mukherjee on Sunday, December 13, 2015. The President along with his team and Governor of West Bengal Keshari Nath Tripathi visited the famous temple 'Natun Mandir' aka 'Naya Mandir' which means 'Newest Temple' in English, i.e, Seth Banshidhar Jalan Smriti Mandir or Bangeshwar Mahadev Mandir in Howrah early morning on Sunday. FYI, the Shiva Temple rests in between Howrah Railway Station and Salkia's Bandhaghat area exactly on Salkia School Road which is both way connected to Kolkata either by road or by river through Golabari-Armenian Ferry Service as well as Bandhaghat-Ahiritola Ferry service too. It would hardly take an hour to reach the landmark if you are connecting the nearby dots I mentioned above during peak traffic hours.




Since the inauguration was of a rarest of rare Lord Shiva statue in my city by The President Of Ind…

कौवा काला क्यूँ होता है?

"दिन में एक बार खाओ और दो बार नहाओ" कुछ अजीब लगता है न सुनने में?  इसके पीछे भी एक पौराणिक कथा है जो मैंने गाँव में सुनी थी। गर्मियों का वक़्त था, ज्यादातर गांववासी दोपहर में "साधू बाबा की कुटी" पर एकत्रित होते थे। आम, बरगद और पीपल के पेड़ के छांव में बाबा की कुटी के बाहर बने चबूतरे पर सब बैठ कर गप्पबाज़ी किया करते थें। मैं भी गाँव गया था स्कूल की गर्मियों की छुट्टी में। तब मोबाइल का जमाना नहीं था और इसलिया लोगों के पास और मेरे पास भी दोपहर में टाइम-पास करने का कोई माध्यम नहीं हुआ करता था।

            पापा और चाचा, कुटी पर पहले से ही जा चुके थे और हर रोज़ की तरह, कुछ बातों और कुछ रोचक जानकारियों का आदान-प्रदान चल रहा था। मैं भी वहाँ पंहुचा तो पता चला की खाने-पिने की बात चल रही थी। गाँव के सभी बड़े लोग वहा पर मौजूद थें। सब इधर-उधर की बातें कर रहे थें और सबका मन्न भी पेड़ो की छांव में बतियाने में लगा हुआ था। तभी 60 वर्षीय  "साधू बाबा" अपने कुटी से निकलें। उनका भी मन्न उस मिटटी के बने और पुअरा (बिचाली) से ढके हुए ठन्डे "कुटी" में नहीं लग रहा था। वो …