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Chhath Puja

We all know that the Chhath Puja was only a part of Northern India,specially peoples from Bihar and Jharkhand used to worship Lord Sun(Surya) by giving Aragh(Pouring water facing towards the Sun). But,worship of Gods can not be accumulated to a certain region in a religious country like India. Today,it is worshiped in almost every part of the country.          In my family,we never did rituals of Chhath Puja,but back few years my maternal grand maa told us to do it as she begged something from Chhath Maa and she fulfilled her wishes. That something was me obviously.So,my mom  started doing this but not full fledgedly as she does not have the physical energy to fulfill all the rituals,as she is old and can't sit and stand for a long time.So,she opted to give a bunch of Bananas to our neighbour aunty who worships chhath puja and goes to Ghat(Shore,may be of river or fresh water pond).          The biggest part of Chhath Puja is cleanliness.It is said and adhered to that the worshiper has to eat only veggie foods along with his or her family and maintain cleanliness from seven days before the puja untill the Puja ends.This years Chhath Puja was as usually on the Ghat of a fresh water pond nearby my locality.Hope,you all know about the rituals of this puja,sotheres nothing to say about it.Heres some pictures of Chhath Puja this year at Liluah.
you can see loads of people all around the pond

Maa sitting with Khushi..

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कलकत्ता का प्रसिद्द बाबा भूतनाथ मंदिर और हावड़ा निवासी भक्त

कुछ
ढूंढली यादें और कंप्यूटर में रक्खे हुए कुछ फोटो ने मेरा ध्यान आकर्षित किया! जैसे ही मैंने फोटो देखने के लिए खोला तो सहसा याद आगया के यह सारे फोटो 2012 के सावन के महीने की हैं! वह मेरा आखरी सावन था जब बाबा धाम से लौटने के बाद, आखरी सोमवार को मैं अपने दोस्तों के साथ कलकत्ता के निमतला समसान घाट स्तिथ बाबा भूतनाथ के मंदिर गया था! आखरी सावन इसलिए क्यूंकि 2013 में पिता जी के परलोक सिधारने के बाद; ना ही मैं बाबा धाम गया और ना ही सावन के महीने में भूतनाथ मंदिर! समय बीतता गया, संन् 2014 आगया और मैं फिर से उसी जगह खड़ा हूँ जहाँ मैंने खुद को छोड़ा था! आज उन्ही यादों और अनुभव को कुछ पुराने फोटो के जरिये आपके सामने ला रहा हूँ!




मैं हावडा में रहता हूँ, इसलिए बाबा के मंदिर जाने के लिए मुझे बांधाघाट लांच घाट से फेरी पकड़नी पड़ती है! इस सुभ यात्रा की शुरुआत गंगा नदी पर सफर करने से शुरू होती है!


गंगा नदी पार करने के बाद, मंदिर के सामने सटे हुए नल से हाथ-पैर धो कर फूल-पत्रिका खरीदने के उपरांत मंदिर के द्वार के सामने लगे हुए कतार में लग जाने की कार्यविधि चालू होती है! सावन के महीने में श्रद्धालुओं के हुजूम क…

Viewing 51 Feet Tall Lord Shiva Statue at Bangeshwar Mahadev Mandir in Howrah, Eastern India.

One of it's kind in Eastern India, this 51 feet tall Lord Shiva statue was unveiled by Honorable President Of India Shri Pranab Mukherjee on Sunday, December 13, 2015. The President along with his team and Governor of West Bengal Keshari Nath Tripathi visited the famous temple 'Natun Mandir' aka 'Naya Mandir' which means 'Newest Temple' in English, i.e, Seth Banshidhar Jalan Smriti Mandir or Bangeshwar Mahadev Mandir in Howrah early morning on Sunday. FYI, the Shiva Temple rests in between Howrah Railway Station and Salkia's Bandhaghat area exactly on Salkia School Road which is both way connected to Kolkata either by road or by river through Golabari-Armenian Ferry Service as well as Bandhaghat-Ahiritola Ferry service too. It would hardly take an hour to reach the landmark if you are connecting the nearby dots I mentioned above during peak traffic hours.




Since the inauguration was of a rarest of rare Lord Shiva statue in my city by The President Of Ind…

कौवा काला क्यूँ होता है?

"दिन में एक बार खाओ और दो बार नहाओ" कुछ अजीब लगता है न सुनने में?  इसके पीछे भी एक पौराणिक कथा है जो मैंने गाँव में सुनी थी। गर्मियों का वक़्त था, ज्यादातर गांववासी दोपहर में "साधू बाबा की कुटी" पर एकत्रित होते थे। आम, बरगद और पीपल के पेड़ के छांव में बाबा की कुटी के बाहर बने चबूतरे पर सब बैठ कर गप्पबाज़ी किया करते थें। मैं भी गाँव गया था स्कूल की गर्मियों की छुट्टी में। तब मोबाइल का जमाना नहीं था और इसलिया लोगों के पास और मेरे पास भी दोपहर में टाइम-पास करने का कोई माध्यम नहीं हुआ करता था।

            पापा और चाचा, कुटी पर पहले से ही जा चुके थे और हर रोज़ की तरह, कुछ बातों और कुछ रोचक जानकारियों का आदान-प्रदान चल रहा था। मैं भी वहाँ पंहुचा तो पता चला की खाने-पिने की बात चल रही थी। गाँव के सभी बड़े लोग वहा पर मौजूद थें। सब इधर-उधर की बातें कर रहे थें और सबका मन्न भी पेड़ो की छांव में बतियाने में लगा हुआ था। तभी 60 वर्षीय  "साधू बाबा" अपने कुटी से निकलें। उनका भी मन्न उस मिटटी के बने और पुअरा (बिचाली) से ढके हुए ठन्डे "कुटी" में नहीं लग रहा था। वो …