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Ganpati Visarjan - A Rare Chance which I gotta experience

Ganesh Visarjan is being performed by Howrah lads on Bandhaghat river shore
Back to back Ganesh Visarjan at Bandhaghat Ferry Ghat
 It was a hectic day on 4th September 2011 as I after finishing the birthday party of TS, went to tutions. While returning back to home made a phone call to a friend just to ask whether Ganpati Visarjan is done or not. Fortunately they were late and I got a chance to experience that moment with friends. Asked them to slow down as it will take 15 minutes from my place to reach them. Went up there, parked my bike and bag in a safe place. Joined them on the streets leading to Ganges ghat, popularly known as Bandhaghat in Howrah. They danced throughout the way upto the ghat celebrating the festival of Ganesh Puja to its fullest. Later they stopped, prayed and submerged the idol of Lord Ganesha into the river Ganges.
Lord Ganesha puja idol immersion visarjan rituals performed at river ganga ghat howrah
Ganesh Visarjan successfully done at Salkia Bandghat Ferry dock



I was lucky to experience this not only because they were late on their way to Ganesh Visarjan but because I was fortunate enough to pray in-front of Lord Ganesha and also had an opportunity to drink coconut water from the coconut which was used to worship him. It really felt nice for the rare chance which I got to experience along with drinking that sweet coconut water. Ganpati Bappa....Morya

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कलकत्ता का प्रसिद्द बाबा भूतनाथ मंदिर और हावड़ा निवासी भक्त

कुछ
ढूंढली यादें और कंप्यूटर में रक्खे हुए कुछ फोटो ने मेरा ध्यान आकर्षित किया! जैसे ही मैंने फोटो देखने के लिए खोला तो सहसा याद आगया के यह सारे फोटो 2012 के सावन के महीने की हैं! वह मेरा आखरी सावन था जब बाबा धाम से लौटने के बाद, आखरी सोमवार को मैं अपने दोस्तों के साथ कलकत्ता के निमतला समसान घाट स्तिथ बाबा भूतनाथ के मंदिर गया था! आखरी सावन इसलिए क्यूंकि 2013 में पिता जी के परलोक सिधारने के बाद; ना ही मैं बाबा धाम गया और ना ही सावन के महीने में भूतनाथ मंदिर! समय बीतता गया, संन् 2014 आगया और मैं फिर से उसी जगह खड़ा हूँ जहाँ मैंने खुद को छोड़ा था! आज उन्ही यादों और अनुभव को कुछ पुराने फोटो के जरिये आपके सामने ला रहा हूँ!




मैं हावडा में रहता हूँ, इसलिए बाबा के मंदिर जाने के लिए मुझे बांधाघाट लांच घाट से फेरी पकड़नी पड़ती है! इस सुभ यात्रा की शुरुआत गंगा नदी पर सफर करने से शुरू होती है!


गंगा नदी पार करने के बाद, मंदिर के सामने सटे हुए नल से हाथ-पैर धो कर फूल-पत्रिका खरीदने के उपरांत मंदिर के द्वार के सामने लगे हुए कतार में लग जाने की कार्यविधि चालू होती है! सावन के महीने में श्रद्धालुओं के हुजूम क…

Viewing 51 Feet Tall Lord Shiva Statue at Bangeshwar Mahadev Mandir in Howrah, Eastern India.

One of it's kind in Eastern India, this 51 feet tall Lord Shiva statue was unveiled by Honorable President Of India Shri Pranab Mukherjee on Sunday, December 13, 2015. The President along with his team and Governor of West Bengal Keshari Nath Tripathi visited the famous temple 'Natun Mandir' aka 'Naya Mandir' which means 'Newest Temple' in English, i.e, Seth Banshidhar Jalan Smriti Mandir or Bangeshwar Mahadev Mandir in Howrah early morning on Sunday. FYI, the Shiva Temple rests in between Howrah Railway Station and Salkia's Bandhaghat area exactly on Salkia School Road which is both way connected to Kolkata either by road or by river through Golabari-Armenian Ferry Service as well as Bandhaghat-Ahiritola Ferry service too. It would hardly take an hour to reach the landmark if you are connecting the nearby dots I mentioned above during peak traffic hours.




Since the inauguration was of a rarest of rare Lord Shiva statue in my city by The President Of Ind…

कौवा काला क्यूँ होता है?

"दिन में एक बार खाओ और दो बार नहाओ" कुछ अजीब लगता है न सुनने में?  इसके पीछे भी एक पौराणिक कथा है जो मैंने गाँव में सुनी थी। गर्मियों का वक़्त था, ज्यादातर गांववासी दोपहर में "साधू बाबा की कुटी" पर एकत्रित होते थे। आम, बरगद और पीपल के पेड़ के छांव में बाबा की कुटी के बाहर बने चबूतरे पर सब बैठ कर गप्पबाज़ी किया करते थें। मैं भी गाँव गया था स्कूल की गर्मियों की छुट्टी में। तब मोबाइल का जमाना नहीं था और इसलिया लोगों के पास और मेरे पास भी दोपहर में टाइम-पास करने का कोई माध्यम नहीं हुआ करता था।

            पापा और चाचा, कुटी पर पहले से ही जा चुके थे और हर रोज़ की तरह, कुछ बातों और कुछ रोचक जानकारियों का आदान-प्रदान चल रहा था। मैं भी वहाँ पंहुचा तो पता चला की खाने-पिने की बात चल रही थी। गाँव के सभी बड़े लोग वहा पर मौजूद थें। सब इधर-उधर की बातें कर रहे थें और सबका मन्न भी पेड़ो की छांव में बतियाने में लगा हुआ था। तभी 60 वर्षीय  "साधू बाबा" अपने कुटी से निकलें। उनका भी मन्न उस मिटटी के बने और पुअरा (बिचाली) से ढके हुए ठन्डे "कुटी" में नहीं लग रहा था। वो …